Monday, March 11, 2019

विमान दुर्घटना: मृतकों में पर्यावरण मंत्रालय की सलाहकार सहित 4 भारतीय

अदीस अबाबा. इथियोपियन एयरलाइंस का बोइंग 737 विमान रविवार को क्रैश हो गया। इसमें सवार सभी 149 यात्री और 8 क्रू मेंबर्स की मौत हो गई। इनमें पर्यावरण मंत्रालय की सलाहकार शिखा गर्ग समेत चार भारतीय थे। सरकारी मीडिया के मुताबिक, मृतकों में 35 देशों के नागरिक शामिल हैं। प्लेन इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा से केन्या के नैरोबी जा रहा था।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विमान हादसे पर शोक जताते हुए बताया कि मारे गए भारतीयों के नाम- वैद्य पन्नागेश भास्कर, वैद्य हासिन अन्नागेश, नुकावारपु मनीषा और शिखा गर्ग हैं। उन्होंने कहा कि इथियोपिया स्थित उच्चायुक्त से भारतीय मृतकों के परिवार वालों की हर तरह की मदद करने को कहा गया है

एयरलाइंस के सीईओ तेवोल्डे गेब्रेमारियम ने बताया कि बोइंग विमान ने स्थानीय समयानुसार सुबह 8.38 बजे उड़ान भरी और इसके 6 मिनट बाद ही इसका संपर्क टूट गया था। अभी हादसे की वजह पता नहीं चल पाई है। हालांकि, पायलट ने इमरजेंसी कॉल किया था। इसके बाद उसे लौटने की अनुमति दी गई।

नवंबर में खरीदा गया था प्लेन

न्यूज एजेंसी के मुताबिक, विमान राजधानी अदीस अबाबा से करीब 60 किलोमीटर दूर बीशोफ्तू के पास क्रैश हुआ। एयरलाइंस ने इस विमान को नवंबर में ही खरीदा था। इथियोपियन एयरलाइन को अफ्रीका की सबसे बड़ी एयरलाइन के तौर पर जाना जाता है। 2010 में भी एयरलाइंस का एक विमान बेरूत से उड़ान भरने के बाद क्रैश हो गया था, तब 90 यात्रियों की जान गई थी।

सबसे ज्यादा केन्या के यात्रियों की मौत

एयरलाइंस के प्रवक्ता ने बताया कि बोइंग विमान में केन्या के 32, इथियोपिया के 17, कनाडा के 18, अमेरिका, इटली और चीन के 8-8, फ्रांस और ब्रिटेन के 7-7, मिस्र के 6, नीदरलैंड के 5, भारत और स्लोवाकिया के 4-4, जर्मनी के 5, रूस, ऑस्ट्रिया और स्वीडन के 3-3, स्पेन, इजरायल, मोरक्को और पोलैंड के 2-2 यात्री सवार थे।

एड्रियाना फ्रेंटी 1982 में इटली से बोधगया घूमने भारत आई थीं। यहां की संस्कृति से प्रभावित होकर उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। बोधगया के ग्रामीण इलाके में 1991 में सफर के दौरान उन्होंने एक लावारिस कुत्तेे के शव को नदी किनारे फेंके जाते देखा। यह देखने के बाद उन्होंने जानवरों के इलाज और उन्हें सम्मानपूर्वक दफनाए जाने का इंतजाम करने की ठानी। इसके बाद उन्होंने धंधवा गांव के रास्ते में जमीन खरीदी और जानवरों का अस्पताल खोला।

यहां अब तक दफन किए जा चुके हैं 3 हजार से ज्यादा जानवर
जानवरों का यह कब्रिस्तान 1992 से अस्तित्त्व में है। कब्रिस्तान में दफन किए जाने के बाद जानवरों की पहचान के लिए एक तख्ती लगाई जाती है, इसमें उनके नाम और उन्हें यहां लाने की तारीख लिखी रहती है। जानवरों के शवों को धार्मिक कर्मकांड के बाद दफनाया जाता है। उन्हें पाली भाषा में लिखे मंत्र के कागज और भगवान बुद्ध को चढ़ाए गए चीवर से ढका जाता है। शव को कंधे पर लेकर संस्था में बने बौद्ध स्तूप की तीन या पांच परिक्रमा करवाई जाती हैं। 27 सालों से यहां गाय, कुत्ता, बकरी, मुर्गी, मछली, कछुआ, खरगोश, पेड़ से मरकर गिरे पक्षियों समेत करीब तीन हजार से भी अधिक जानवरों को इस कब्रिस्तान में दफनाया गया है।

बीमार जानवरों को ग्रामीण और शहरी इलाके से लाते हैं
जानवरों के संरक्षण में लगीं एड्रियाना फ्रेंटी की संस्था के कर्मचारी ग्रामीण और शहरी इलाकों से लावारिस बीमार जानवरों को लाते हैं और उन्हें संस्था के अस्पताल में रखकर इलाज किया जाता है। साथ ही जरूरत पड़ने पर कुशल चिकित्सक के द्वारा पशुओं का ऑपरेशन भी किया जाता है। उसे संस्था में पूरी तरह ठीक होने तक रखा जाता है। फिर उसे उसके इलाके में ले जाकर छोड़ दिया जाता है। अधिक बीमारी के कारण जो जानवर मर जाता है। तय जमीन पर दफन किया जाता है।

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