उस भोज का ज़िक्र करते हुए जेम्स टोड अपनी किताब 'एनल्स एंड एंटीक्वीटीज़ ऑफ़ राजस्थान' में लिखते हैं, "मान सिंह ने कहा कि मुझे पेट दर्द का बहाना अच्छी तरह से मालूम है. मैं तब तक एक भी निवाला अपने मुंह में नहीं डालूंगा, जब तक प्रताप खुद मेरे सामने थाली नहीं रखते. तब हम दोनों एक थाली से साथ खाना खाएंगे."
"प्रताप ने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि वो ऐसे राजपूत के साथ खाना नहीं खा सकते जिसने अपनी बुआ को शादी में तुर्कों को दे दिया है."
इस मुलाकात का ज़िक्र न तो अबुल फ़ज़ल ने 'अकबरनामा' में और न ही अब्दुल क़ादिर बदायूंनी ने 'मनतख़ब-उत-तारीख़' में किया है.
हाँ, अमरकाव्य वंशावली में राज रत्नाकर ने इस मुलाक़ात का वर्णन करते हुए लिखा है, "जब मान सिंह बीच में ही भोज छोड़ कर उठने लगे तो प्रताप ने उन पर कटाक्ष किया कि उन्हें अपने फूफा अकबर के साथ वहाँ आना चाहिए था."
"मान सिंह के जाने के बाद प्रताप ने उन बर्तनों और थालियों को धुलवाया जिसमें उन्हें खाना परोसा गया था, ताकि उनकी नज़रों में उस पाप को धोया जा सके जो उन्होंने अपनी बुआ को सम्राट को शादी में देकर किया था."
जगमाल को बनाया था अपना वारिस
मान सिंह से पहले उनके पिता भगवंत दास और अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल भी अकबर की तरफ़ से महाराणा प्रताप को मनाने आ चुके थे, लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिली थी.
28 फ़रवरी, 1572 को राणा उदय सिंह का देहांत होने से पहले उन्होंने अपने नौवें नंबर के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी बनाया, हालांकि राणा प्रताप उनके सबसे बड़े पुत्र थे. ये अलग बात है कि मेवाड़ के मंत्रियों और दरबारियों ने अंतत: राणा प्रताप को ही गद्दी पर बैठवाया.
'महाराणा प्रताप- द इनविंसिबिल वारियर' की लेखिका रीमा हूजा बताती हैं, "राणा उदय सिंह ने बीस से अधिक शादियाँ की थीं. राणा प्रताप उनके सबसे बड़े पुत्र थे. उनके 25 भाई और 20 बहनें थीं. जब उदय सिंह का देहांत हुआ तो प्रताप उन्हें मुखाग्नि देने नहीं गए, क्योंकि उस समय तक मेवाड़ में प्रथा थी कि सबसे बड़ा पुत्र पिता के दाह संस्कार के समय राजमहल में ही रहता था, ताकि अगर कोई दुश्मन उस समय हमला कर दे तो वो उससे निपट सके."
"जब प्रताप के मामा अखई राज और ग्वालियर के राम सिंह को जो उस समय मेवाड़ में रह रहे थे, को राजकुमार जगमाल अंत्येष्टि स्थल पर नहीं मिले तो उन्होंने उनके बारे में पूछा. पता चला कि वो राजमहल के अंदर है और वहाँ उनके राज्याभिषेक की तैयारी चल रही है. वो तुरंत राजमहल में गए. वहाँ जगमाल उस गद्दी पर बैठे हुए थे जिस पर महाराणा उदय सिंह बैठा करते थे."
"उन दोनों ने दाहिने और बांए तरफ़ से उनका एक-एक हाथ पकड़ा और ज़बरदस्ती उस स्थान पर बैठा दिया जहाँ महाराणा के पुत्र बैठा करते थे. फिर प्रताप की खोज हुई. वो शहर के बाहर कुछ लोगों के साथ एक बावड़ी पर बैठे हुए थे और राज्य से बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे. उनको राणा बनने के लिए मनाया गया और वहीं पर उन्हें एक पत्थर पर बैठा कर उनका राज्याभिषेक किया गया."
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